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Wednesday, October 26, 2011

एक ऐसी दीपावली

नफ़रतों की अमावस में प्रीत की लौ जलायें


आइये इस दिवाली हँसी की फुलझड़ियाँ चलायें ।।


उजाले आज सब आपस में बाँट लें

दुःखों के ढेर से खुशियों को छाँट लें ।

लक्ष्मी जी आयें जो मेरे अँगना

पता तुम्हारा भी थमा दूँ उन्हें ।

आज हाथ हो किसी का तंग ना,

थोड़ा-सा अपनापन देते हैं उन्हें

जो जी जला रोटियाँ पकायें ।

चलें, अपने दिये से दिये सब जलायें ।।


नफ़रतों की अमावस में प्रीत की लौ जलायें

आइये इस दिवाली हँसी की फुलझड़ियाँ चलायें ।।



आप सब को दीपावली की शुभकामनायें



Thursday, June 23, 2011

सपने

बेरंग थे सपने मेरे
रंग तुमसे आये हैं,
अमावस की रात में
फिर सपने छाये हैं ।

ढलती रातों में
गालों पे ढुलकते
रंग आँसुओं के ।

पल-पल बदलती है
जो मुस्कान तेरी,
हैं छुपे उसमें
रंग मेरी वफ़ाओं के ।

बच्चे के बचपन में
भरे रंग शरारत के,
और यौवन के सपनों में
हैं रंग मुहब्बत के ।

हो बेरंग तो
है अमावस यह ज़िंदगी,
अमावस की रात को
है रंग दीपावली ।


Saturday, August 15, 2009

स्त्री

सीने में सागर की लहरें
आँखों में ममता होगी
इस जग के कितने हों पहरे
फिर भी वह ज़िंदा होगी ।

अंतर में भविष्य
मन में अतीत
और आँखों में वर्तमान...

प्रेम की हर बूंद
संजो सीप-से मन में
इंतज़ार करती ख़ामोश
उसके मोती बनने का ।

तन सृजन सामर्थ्य लिए
मन प्रेम काव्य कहे
और कहते हो तुम कि कमज़ोर है यह?

सीता-सी हर पल
अग्निपरीक्षा देती,
या राधा बन
वियोग-पीड़ा सहती,
कच्चा घड़ा ले हीर बन
कहीं गहराइयों में डूबती,
पुरुषों के जग में
ख़ामोशी की ताकत लिए,
चुपचाप, हर कदम
मन में जूझने की हिम्मत लिए
वो अकेली
अंधेरों से लड़े जा रही है ।

मौत देने की क्षमता
को ताकत समझने वालो,
देखो,
इस अंधियारे जग में
हर अमावस को दिवाली बना रही है ।

आज भी चुपचाप
वह एक नया भविष्य जने जा रही है ।

कहो कब, कहाँ, कैसे, क्यों कमज़ोर है यह?

कितनी बार
अत्याचारी,
बलात्कारी बन
दबाया था इसे?

फिर भी यह धूल देखो कैसे गगन पर छा रही है ।