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Saturday, August 15, 2009

स्त्री

सीने में सागर की लहरें
आँखों में ममता होगी
इस जग के कितने हों पहरे
फिर भी वह ज़िंदा होगी ।

अंतर में भविष्य
मन में अतीत
और आँखों में वर्तमान...

प्रेम की हर बूंद
संजो सीप-से मन में
इंतज़ार करती ख़ामोश
उसके मोती बनने का ।

तन सृजन सामर्थ्य लिए
मन प्रेम काव्य कहे
और कहते हो तुम कि कमज़ोर है यह?

सीता-सी हर पल
अग्निपरीक्षा देती,
या राधा बन
वियोग-पीड़ा सहती,
कच्चा घड़ा ले हीर बन
कहीं गहराइयों में डूबती,
पुरुषों के जग में
ख़ामोशी की ताकत लिए,
चुपचाप, हर कदम
मन में जूझने की हिम्मत लिए
वो अकेली
अंधेरों से लड़े जा रही है ।

मौत देने की क्षमता
को ताकत समझने वालो,
देखो,
इस अंधियारे जग में
हर अमावस को दिवाली बना रही है ।

आज भी चुपचाप
वह एक नया भविष्य जने जा रही है ।

कहो कब, कहाँ, कैसे, क्यों कमज़ोर है यह?

कितनी बार
अत्याचारी,
बलात्कारी बन
दबाया था इसे?

फिर भी यह धूल देखो कैसे गगन पर छा रही है ।

Thursday, August 13, 2009

दर्द

सदियों तक रगों में बहते-बहते
दर्द लावा-सा बन जाता है ।

धीरे-धीरे साँझ ढलते-ढलते
आँखों से लहू बन बह जाता है ।

हर लम्हा एक पल ज़िंदगी है,
सूरज भी तो पल भर में ढल जाता है ।

आँसुओं की उम्र लंबी होती है
हर आँसू एक ज़ख्म बन जाता है ।

समय कोई ज़ख्म नहीं भरता
हर बीतता लम्हा इसे नासूर कर जाता है ।

Tuesday, August 11, 2009

तप

अग्नि से मुझको डर नहीं लगता
खुद अग्नि बन जलती हूँ;
ज्वाला हूँ पर तेरी लगन में
ज्योति बन मैं जलती हूँ;
तुम जग के मेले में खोए
मैं तेरे नाम की माला जपती हूँ ॥

दो पल का अहसास नहीं
है तप यह मेरे जीवन का;
है मधुर मिलन की आस यहीं
होगा संगम इस तन-मन का ॥

तुम से मिले तो ऐसे मिले
ज्यों धरती-अंबर मिलते हैं;
मन मंदिर में ऐसे खिले
ज्यों पारिजात वन में खिलते हैं ।

Saturday, August 8, 2009

नृत्य

शहर की भीड़ में खोए
भूल गए सावन के झूले,
नरम बिस्तर पर सोए
पर अहसास कहाँ जो मन छू ले ?

आज थिरकते पाँवों में
अहसास कहाँ है जीने का?
यूं ही मचलते जिस्मों में
दर्द कहाँ है सीने का ?

नृत्य
है अभिव्यक्ति आत्मा की
या पूजा उस परमात्मा की ।
बाहरी आडंबर नहीं
यह
थिरकन राधा के पाँव की
या मस्ती मीरा के मन की ।

Sunday, August 2, 2009

मुलाकात

जीवन की राह पर
चलते-चलते
सपने से मिले थे हम,
अपने से मिले थे हम ।
ख़ामोशी की दीवार भी थी,
एक आँसू की धार भी थी ।
कसक-सी थी बिछुड़ने की,
उम्मीद मगर थी उड़ने की ।।

वो पल
जब आत्माओं ने सच स्वीकारा था,
जो आसमां का इशारा था,
उस पल में हम खो गए थे
हाँ, तुम्हारे हो गए थे ।।

फिर कितने बरस की दूरी थी,
मिलने की आस अधूरी थी ।
तुम आते थे सपनों में,
थे अकेले हम अपनों में ।।

बस उस पल की
धरोहर है जीवन ।।


© 02 August, 2009

Saturday, August 1, 2009

जियाकोमेती को...

तेरी राह देखते-देखते पथरा-सी गई हूँ मैं,
अंतर में अंगार लिए जड़ हो गई हूँ मैं ।

अपनी धरती से जुड़ आज उठ रही हूँ ऊपर
जड़ें बाहर जो दिखतीं हैं -
वो नहीं ।
जड़ें वो हैं जो मेरे अंदर से निकलीं हैं ।
विष्णु की तरह मेरे अंतर के कमल पर
तुम ब्रह्मा बन खिल रहे हो ।

महान हो भले तुम
मगर याद रखो
मेरे बिना अस्तित्व नहीं तुम्हारा ।

चलायमान तुम
थक जाओगे
सच खोजते-खोजते ।

मैं एक जगह खड़ी
अपने अंतर में ही
सत्य पा जाऊंगी ।

ठहरी हूँ
पर पड़ाव है यह
नदिया को कौन रोक पाया है ?

स्त्री निष्क्रिय,
पुरुष सक्रिय,
मगर क्या खोज रहे हो तुम?

सत्य वह नहीं - जो बाहर है ।
सत्य तुम्हारे ही अंतर में छुपा है
क्षण भर रुको
ठहरो ।


© 27 July 2009 .

जियाकोमेती

Tuesday, July 21, 2009

उपहार

आज सावन बरसे है यूं
ज्यों खुशियों का आवन हो,
झूम-झूम मन मयूर नाचे यूं
जैसे पी का आगमन हो ।

आज कुमुदिनी के खिलने का दिन है
कहतीं हैं नदिया की लहरें
तभी तो रिमझिम बरसे है
टूटें हैं पवनों के पहरे ।

एक लहर-सी आई है झूम के
आसमां को चूम के
पर्वतों को पार कर
आज समय की धार पर ।

यह प्रकृति का संगीत है
फूलों का मधुमय गीत है,
दिल में दबी एक आग है
या मल्हार राग है?

देखो जन्मदिन पर तुम्हारे
आए हैं मिल कर यह सारे
दिल में भर कर प्यार
लाए हैं खुशियों का उपहार ।

साल-दर-साल आएगा
यह दिन खुशियां बरसाएगा,
चलता रहेगा यह सफ़र
हाँ, समय की ताल पर ।

© 21 july 2009

Tuesday, December 16, 2008

दुल्हन

सोचा था एक दिन हाथों में मेंहदी लगेगी,
दुल्हन के जैसे मेरी भी मांग सजेगी;
आओगे मेरे द्वारे तुम घोड़ी पर चढ़ कर,
ले जाओगे मुझको तुम अपना कर ॥

© 2008

Sunday, June 8, 2008

ख़ामोशी

क्यों मेरी ख़ामोशी को तुम एक नाम देते हो?
यह अन्जान आवाज़ है,
एक बच्चे-सी
जो अभी सीख रहा है बोलना
इसलिये चुप है

मेरी ख़ामोशी अभी एक सूरज है
जो रात के दामन में छुपा
इंतज़ार कर रहा है वक्त का
वक्त - जिसके आने पर
उजाले का रूप ले
यह निकलेगा पूरब से
यही ख़ामोशी मेरी ज़ुबान है

मैं
मैं कौन?
जान लेंगे एक दिन
अभी बस ख़ामोशी...

copyright June 2008, (blog: sahitya-goshthi)