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Tuesday, May 24, 2016

पितृ

प्रति श्वास
प्रति स्पंदन
पिता,
करूँ मैं तव चरणन में नमन,
तव प्रेम-रचित
कृति
श्रद्धा-निहित मति,
तव स्नेह अह्लादित मम् मन ।
वेद प्रथम तव स्वर सुने,
सीखी संस्कृति-संस्कृत तुम्हीं से,
विज्ञान-ज्ञान सागर तुम्हीं,
हम मात्र सागर की लहर हैं,
द्वितीय प्रहर हो रात्रि का,
या हो कड़कती धूप पिता,
हो पाठ गणित या क्रीड़ा का,
रहे पथ-प्रदर्शक तुम सदा ।
प्रति श्वास
प्रति स्पंदन
पिता,
करूँ मैं तव चरणन में नमन ।

Thursday, September 13, 2012

नारी

प्रेरणा, प्रेयसी
नारी नारायणी
है सार संसार का ।

है माता कभी
कभी अर्धांगिनी,
कभी खिलती हुई-सी कली ।

हृदय परिपूर्ण
प्रेम, ममत्व सदा,
प्रलय की ज्वाल अंतर लिये
दुष्टों के लिये काल-कालिका है यह,
है यही राधिका कृष्ण की ।

प्रेरणा, प्रेयसी
नारी नारायणी
है सार संसार का ।


Friday, August 10, 2012

अहम्

अहम्
हाँ, जाने कब, क्यों, कैसे
स्वयं मैं,
बन गया प्रतीक
टूटते संबंधों
बिखरते सपनों का ।
कभी तो रौशन
तो कभी अंधकारमय,
अहम्
मैं
से बन गया अभिमान मेरा ।
टूटते सपनों
भटकते कदमों
ने न जाने कब
बना दी
दीवार-सी
दिलों के दरमियान
क्यों आ खड़ा हुआ
अहम् ?


Friday, December 16, 2011

आँसू

अचानक
बिन बुलाए मेहमान-से
आँखों में ठहर-से गए,
ठंड से जम गए जो
गालों के गुलाबों पे ,
लगीं जो चटकने
पलकों की कलियाँ ।

जो घड़ियां इंतज़ार की
हिमालय हुईं,
लम्हों से घंटे
घंटो से दिन जो
बनने लगे,
ख़ामोश दिल ने
कहा फिर किसी से,
आओ,
ठहरो,
बैठो
एक पल पास मेरे ।

कुछ कहो दिल की
कुछ सुनो दिल से
या आँखों को कहने दो
अपनी कहानी ।

Wednesday, October 26, 2011

एक ऐसी दीपावली

नफ़रतों की अमावस में प्रीत की लौ जलायें


आइये इस दिवाली हँसी की फुलझड़ियाँ चलायें ।।


उजाले आज सब आपस में बाँट लें

दुःखों के ढेर से खुशियों को छाँट लें ।

लक्ष्मी जी आयें जो मेरे अँगना

पता तुम्हारा भी थमा दूँ उन्हें ।

आज हाथ हो किसी का तंग ना,

थोड़ा-सा अपनापन देते हैं उन्हें

जो जी जला रोटियाँ पकायें ।

चलें, अपने दिये से दिये सब जलायें ।।


नफ़रतों की अमावस में प्रीत की लौ जलायें

आइये इस दिवाली हँसी की फुलझड़ियाँ चलायें ।।



आप सब को दीपावली की शुभकामनायें



Thursday, August 20, 2009

पंजाब: कल्चर और एग्रीकल्चर

मैं सबसे पहले इन्सान और फिर भारतीय हूँ । मगर सच यह भी है कि मैं पंजाब से हूँ - एक ऐसा राज्य जिसे पाँच नदियों ने माँ बन अपने प्यार से सींचा है । कई साल हुए मैं इन्सान और भारतीय होने को तो बहुत महत्त्व देती थी मगर पंजाब से प्यार और लगाव के बावजूद कुछ ख़ास जज़्बा नहीं था । मुझे इस बात का गर्व था कि मैं एक ऐसे छोटे से राज्य से हूँ जिसके पास बहुत कम ज़मीन है और प्राकृतिक संसाधन भी कुछ अधिक नहीं हैं मगर जहाँ के लोगों के मेहनती स्वभाव के कारण यह राज्य भारत के सबसे संपन्न राज्यों में से एक था । इतनी कम धरती पर खेती कर हमने सोना उपजाने की कला में महारत हासिल की थी । हमारे देश-प्रेम को किसी भी प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं थी क्यों कि सदियों से हमारे पूर्वज इसका प्रमाण देते आए थे । हम खुद को अलग नहीं समझते थे क्योंकि हम भारतीय थे और इस धरती के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने कई कुर्बानियां दीं थीं । मगर फिर कई लोगों से सुना कि पंजाब में एग्रीकल्चर तो है पर कल्चर नहीं है! यह सच नहीं मगर आप किसी के मुँह पर ताला तो नहीं लगा सकते । शायद हमारे कल्चर को लोग समझ नहीं पाए या फिर हमने ही लोगों तक इसे पहुंचाना ज़रूरी नहीं समझा । हमारा कल्चर सबसे पहले एकता का था, भाईचारे का था और आत्मसम्मान का था । हम भूल नहीं सकते कि पश्चिम में होने के कारण कई आक्रमणकारी सबसे पहले पंजाब - राजस्थान की तरफ़ से आए । हमें कहाँ समय था कि हम पल भर को आराम करें । हमें तो इनसे अपना देश बचाना था । फिर भी ऐसा नहीं कि हमारे अपने त्योहार न हों या साहित्यिक ग्रंथ न हों । हमने तलवारों की छाँव में कविताएं रचीं और प्यार का संदेश दुनिया को दिया ।
मगर कुछ लोगों के इस विचार का जवाब देने के लिए यह समझना ज़रूरी है कि आखिर कल्चर या संस्कृति क्या है । क्या यह नृत्य-संगीत है? तो क्या पंजाब में संगीत की कमी है? सोचिए कई दशकों तक हिंदी फ़िल्में भी जिस संगीत व नृत्य से सराबोर रहीं और जहाँ का नृत्य व संगीत सारी दुनिया में जोश से भरे भारत का प्रतीक बन गया था, क्या वहाँ इनकी कमी है? कविताएं? क्या पंजाब में कवि नहीं हुए? आपने हीर तो देखी होगी । हीर-राँझा की कहानी एक कविता के रूप में वारिस शाह ने लिखी थी । शायद कुछ ही लोगों को पता हो कि पंजाबी के पहले कवि कौन थे । उनका नाम था बाबा फ़रीद । और फिर बुल्ले शाह को कैसे भूल सकते हैं? आज भी उनकी लिखी काफ़ी पंजाब में गाईं व सुनीं जातीं हैं ।
पंजाब में भी कवि-सम्मेलन और मुशायरे होते हैं । पंजाबी कविता से मेरा पहला परिचय मेरी माँ ने कराया था । नहीं मुझे कविताओं की किताब नहीं मिली थी । मुझे एक कविता सुनाई थी मेरी माँ ने । यह पहला परिचय था - मेरा और पंजाबी कविता का । पंजाबी भाषा की मिठास, हाँ मिठास जो यूं ही कही बात को कविता बना देती है । अजीब लगा न? मगर सोचें कि कितनी ही पंजाबी कविताएं व गीत दरअसल बात-चीत के ढंग से लिखे गए हैं और फिर भी दिल को छूने की क्षमता रखते हैं । उनमें गीत-संगीत की कमी नहीं ।
क्या भगत सिंह की घोड़ी एक अनुपम रचना नहीं? या फिर शिव कुमार बटालवीअमृता प्रीतम कवि नहीं? भले ही हम अपनी मेहनत, हिम्मत और मिट्टी को सोना बनाने की क्षमता के लिए जाने जाते हों लेकिन तलवारों की छाँव में भी हमारे मुख से गीत निकलते हैं । हम इस धरती को माँ समझ उसकी तन-मन-धन से सेवा कर उसी पर न्यौछावर होने वाले हैं मगर हमने सर्व-धर्म समभाव को एक नया अर्थ दिया - गुरबानी के रूप में । गुरू ग्रंथ साहब जो हिंदु-मुस्लिम नामक गंगा-यमुना को सरस्वती बन संगम प्रदान करती है । अगर हम अपनी धरती के लिए जान देना जानते हैं तो शांति का संदेश देती गुरबानी रोज़ गूंजती है हमारे गाँवों और शहरों में । यह है खूबसूरती पंजाब की... यह है पंजाब का कल्चर । देश-प्रेम और संस्कृति, तलवार और शांति का ऐसा अनूठा संगम और कहाँ मिलेगा ?
मगर यह सच है कि पंजाब भारत की रग-रग में ऐसे घुल गया है कि महसूस ही नहीं होता कि यह अलग संस्कृति है । हमने सर्वस्व समर्पित कर भारत के दिल में जगह बनाई है । पंजाब अनोखा है, दुनिया हिंदू और सिख को अलग धर्म मानती है मगर पंजाब के दिल में झांक कर देखें । "हिंदू" अगर गुरद्वारे जाता है तो "सिख" भी चंडी पाठ करता है । वैष्णो देवी जाने वाले भक्तों में कितने हिंदू और कितने सिख हैं, गिन कर देखें? हम खुद को जानते हैं और पहचानते हैं अपने अस्तित्व को । हमने प्यार को जाना है और सर्वस्व समर्पित कर घुल गए हैं भारत में और भले ही हम नहीं भूले कविता और तलवार का अपना इतिहास मगर ऊंचे स्वर में चिल्लाने की ज़रूरत हमें महसूस नहीं होती क्योंकि हम खुद को जानते हैं । हमारे अस्तित्व को किसी प्रमाणपत्र की कोई ज़रूरत नहीं । यही है पंजाब का कल्चर ।

Saturday, August 15, 2009

स्त्री

सीने में सागर की लहरें
आँखों में ममता होगी
इस जग के कितने हों पहरे
फिर भी वह ज़िंदा होगी ।

अंतर में भविष्य
मन में अतीत
और आँखों में वर्तमान...

प्रेम की हर बूंद
संजो सीप-से मन में
इंतज़ार करती ख़ामोश
उसके मोती बनने का ।

तन सृजन सामर्थ्य लिए
मन प्रेम काव्य कहे
और कहते हो तुम कि कमज़ोर है यह?

सीता-सी हर पल
अग्निपरीक्षा देती,
या राधा बन
वियोग-पीड़ा सहती,
कच्चा घड़ा ले हीर बन
कहीं गहराइयों में डूबती,
पुरुषों के जग में
ख़ामोशी की ताकत लिए,
चुपचाप, हर कदम
मन में जूझने की हिम्मत लिए
वो अकेली
अंधेरों से लड़े जा रही है ।

मौत देने की क्षमता
को ताकत समझने वालो,
देखो,
इस अंधियारे जग में
हर अमावस को दिवाली बना रही है ।

आज भी चुपचाप
वह एक नया भविष्य जने जा रही है ।

कहो कब, कहाँ, कैसे, क्यों कमज़ोर है यह?

कितनी बार
अत्याचारी,
बलात्कारी बन
दबाया था इसे?

फिर भी यह धूल देखो कैसे गगन पर छा रही है ।

Thursday, August 13, 2009

दर्द

सदियों तक रगों में बहते-बहते
दर्द लावा-सा बन जाता है ।

धीरे-धीरे साँझ ढलते-ढलते
आँखों से लहू बन बह जाता है ।

हर लम्हा एक पल ज़िंदगी है,
सूरज भी तो पल भर में ढल जाता है ।

आँसुओं की उम्र लंबी होती है
हर आँसू एक ज़ख्म बन जाता है ।

समय कोई ज़ख्म नहीं भरता
हर बीतता लम्हा इसे नासूर कर जाता है ।

Tuesday, August 11, 2009

तप

अग्नि से मुझको डर नहीं लगता
खुद अग्नि बन जलती हूँ;
ज्वाला हूँ पर तेरी लगन में
ज्योति बन मैं जलती हूँ;
तुम जग के मेले में खोए
मैं तेरे नाम की माला जपती हूँ ॥

दो पल का अहसास नहीं
है तप यह मेरे जीवन का;
है मधुर मिलन की आस यहीं
होगा संगम इस तन-मन का ॥

तुम से मिले तो ऐसे मिले
ज्यों धरती-अंबर मिलते हैं;
मन मंदिर में ऐसे खिले
ज्यों पारिजात वन में खिलते हैं ।

Saturday, August 8, 2009

नृत्य

शहर की भीड़ में खोए
भूल गए सावन के झूले,
नरम बिस्तर पर सोए
पर अहसास कहाँ जो मन छू ले ?

आज थिरकते पाँवों में
अहसास कहाँ है जीने का?
यूं ही मचलते जिस्मों में
दर्द कहाँ है सीने का ?

नृत्य
है अभिव्यक्ति आत्मा की
या पूजा उस परमात्मा की ।
बाहरी आडंबर नहीं
यह
थिरकन राधा के पाँव की
या मस्ती मीरा के मन की ।

Sunday, August 2, 2009

मुलाकात

जीवन की राह पर
चलते-चलते
सपने से मिले थे हम,
अपने से मिले थे हम ।
ख़ामोशी की दीवार भी थी,
एक आँसू की धार भी थी ।
कसक-सी थी बिछुड़ने की,
उम्मीद मगर थी उड़ने की ।।

वो पल
जब आत्माओं ने सच स्वीकारा था,
जो आसमां का इशारा था,
उस पल में हम खो गए थे
हाँ, तुम्हारे हो गए थे ।।

फिर कितने बरस की दूरी थी,
मिलने की आस अधूरी थी ।
तुम आते थे सपनों में,
थे अकेले हम अपनों में ।।

बस उस पल की
धरोहर है जीवन ।।


© 02 August, 2009

Saturday, August 1, 2009

जियाकोमेती को...

तेरी राह देखते-देखते पथरा-सी गई हूँ मैं,
अंतर में अंगार लिए जड़ हो गई हूँ मैं ।

अपनी धरती से जुड़ आज उठ रही हूँ ऊपर
जड़ें बाहर जो दिखतीं हैं -
वो नहीं ।
जड़ें वो हैं जो मेरे अंदर से निकलीं हैं ।
विष्णु की तरह मेरे अंतर के कमल पर
तुम ब्रह्मा बन खिल रहे हो ।

महान हो भले तुम
मगर याद रखो
मेरे बिना अस्तित्व नहीं तुम्हारा ।

चलायमान तुम
थक जाओगे
सच खोजते-खोजते ।

मैं एक जगह खड़ी
अपने अंतर में ही
सत्य पा जाऊंगी ।

ठहरी हूँ
पर पड़ाव है यह
नदिया को कौन रोक पाया है ?

स्त्री निष्क्रिय,
पुरुष सक्रिय,
मगर क्या खोज रहे हो तुम?

सत्य वह नहीं - जो बाहर है ।
सत्य तुम्हारे ही अंतर में छुपा है
क्षण भर रुको
ठहरो ।


© 27 July 2009 .

जियाकोमेती

Tuesday, July 21, 2009

उपहार

आज सावन बरसे है यूं
ज्यों खुशियों का आवन हो,
झूम-झूम मन मयूर नाचे यूं
जैसे पी का आगमन हो ।

आज कुमुदिनी के खिलने का दिन है
कहतीं हैं नदिया की लहरें
तभी तो रिमझिम बरसे है
टूटें हैं पवनों के पहरे ।

एक लहर-सी आई है झूम के
आसमां को चूम के
पर्वतों को पार कर
आज समय की धार पर ।

यह प्रकृति का संगीत है
फूलों का मधुमय गीत है,
दिल में दबी एक आग है
या मल्हार राग है?

देखो जन्मदिन पर तुम्हारे
आए हैं मिल कर यह सारे
दिल में भर कर प्यार
लाए हैं खुशियों का उपहार ।

साल-दर-साल आएगा
यह दिन खुशियां बरसाएगा,
चलता रहेगा यह सफ़र
हाँ, समय की ताल पर ।

© 21 july 2009

Tuesday, December 16, 2008

दुल्हन

सोचा था एक दिन हाथों में मेंहदी लगेगी,
दुल्हन के जैसे मेरी भी मांग सजेगी;
आओगे मेरे द्वारे तुम घोड़ी पर चढ़ कर,
ले जाओगे मुझको तुम अपना कर ॥

© 2008

Sunday, June 8, 2008

ख़ामोशी

क्यों मेरी ख़ामोशी को तुम एक नाम देते हो?
यह अन्जान आवाज़ है,
एक बच्चे-सी
जो अभी सीख रहा है बोलना
इसलिये चुप है

मेरी ख़ामोशी अभी एक सूरज है
जो रात के दामन में छुपा
इंतज़ार कर रहा है वक्त का
वक्त - जिसके आने पर
उजाले का रूप ले
यह निकलेगा पूरब से
यही ख़ामोशी मेरी ज़ुबान है

मैं
मैं कौन?
जान लेंगे एक दिन
अभी बस ख़ामोशी...

copyright June 2008, (blog: sahitya-goshthi)