Sunday, June 8, 2008

ख़ामोशी

क्यों मेरी ख़ामोशी को तुम एक नाम देते हो?
यह अन्जान आवाज़ है,
एक बच्चे-सी
जो अभी सीख रहा है बोलना
इसलिये चुप है

मेरी ख़ामोशी अभी एक सूरज है
जो रात के दामन में छुपा
इंतज़ार कर रहा है वक्त का
वक्त - जिसके आने पर
उजाले का रूप ले
यह निकलेगा पूरब से
यही ख़ामोशी मेरी ज़ुबान है

मैं
मैं कौन?
जान लेंगे एक दिन
अभी बस ख़ामोशी...

copyright June 2008, (blog: sahitya-goshthi)

1 comment:

Mohit said...

allllllllll line are touch in heart.... khamoshi khabi nai jathi ......