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Friday, December 16, 2011

आँसू

अचानक
बिन बुलाए मेहमान-से
आँखों में ठहर-से गए,
ठंड से जम गए जो
गालों के गुलाबों पे ,
लगीं जो चटकने
पलकों की कलियाँ ।

जो घड़ियां इंतज़ार की
हिमालय हुईं,
लम्हों से घंटे
घंटो से दिन जो
बनने लगे,
ख़ामोश दिल ने
कहा फिर किसी से,
आओ,
ठहरो,
बैठो
एक पल पास मेरे ।

कुछ कहो दिल की
कुछ सुनो दिल से
या आँखों को कहने दो
अपनी कहानी ।

Sunday, June 8, 2008

ख़ामोशी

क्यों मेरी ख़ामोशी को तुम एक नाम देते हो?
यह अन्जान आवाज़ है,
एक बच्चे-सी
जो अभी सीख रहा है बोलना
इसलिये चुप है

मेरी ख़ामोशी अभी एक सूरज है
जो रात के दामन में छुपा
इंतज़ार कर रहा है वक्त का
वक्त - जिसके आने पर
उजाले का रूप ले
यह निकलेगा पूरब से
यही ख़ामोशी मेरी ज़ुबान है

मैं
मैं कौन?
जान लेंगे एक दिन
अभी बस ख़ामोशी...

copyright June 2008, (blog: sahitya-goshthi)