Sunday, December 11, 2016

परिचय

ज़िंदगी बता
मेरा परिचय है क्या,
विज्ञान का है कहना
कि पशु हूँ सबसे ऊँचा,
ख़ाक कह्ती है मुझे
कि हूँ मैं उठता हुआ धुआं
ज़िंदगी बता मेरा परिचय है क्या ॥ १ ॥

फूल कहता है
ओस की बूंद है तू,
पवन का है कहना
तू है मेरी ख़ुशबू,
रात को जलती हुई
तिल−तिल कर मरती हुई,
कहती है शमां –
तू रोशनी है ।
ज़िंदगी बता मेरा परिचय है क्या ॥ २ ॥

मिट्टी बताती है,
बीज बोने पर
वर्षा और धूप से
निखरते हुए रूप में
उगती फ़सल है तू ।
संत कहते ये रहे –
अत्योत्तम कायायुक्त
ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है तू,
ऐ ज़िंदगी बता मेरा परिचय है क्या ॥ ३ ॥

वृक्षों की छाया से
पल−पल सिक्त हो के
भीगती−बरसती−सी
घटा है तू ।
या पलक से गिरते हुए
फ़लक पे चमकते से
सितारों में
चुपचाप सहती हुई
कुछ न कहती हुई –
एक मजबूरी है तू ।
जो ले के कलम
हो जाए शुरू
तो
एक भंवर है तू ।
सृष्टि को करने को
पल में तू ख़ाक कर दे,
डालों के इस पलने को
जला के राख कर दे,
हाँ, वही प्रलय है तू
ऐ ज़िंदगी बता मेरा परिचय है क्या ॥ ४ ॥



Wednesday, August 17, 2016

भनोत्

जो चिता पर हाथ जोड़े खड़ीं हैं वे माँ हैं मेरी ।

मैं ज़ोर-ज़ोर से रोते-रोते पुकार रहा हूँ – माँ, मत जाओ ।  माँ, रुक जाओ ।  पर माँ, मेरी माँ, जाने क्यों चली जा रहीं हैं ?

माँ जली जा रहीं हैं ।

मैं रो रहा हूँ ।

माँ जा रहीं हैं ।

माँ...

माँ...

माँ...


सन्नाटा ।

सब चुप ।

मैं रो रहा हूँ ।

तभी कोई आया ।  कौन ?  कौन हो तुम ?

श....

गोद को पालना बना झुला रहे हैं मुझे ।

मैं रो रहा हूँ ।

मैं रो रहा हूँ ।

माँ ।

मेरी माँ ।

कहाँ गयीं माँ ?

मैं तो अभी आया हूँ ?

क्या किया मैंने ?  माँ, क्यों क्रोधित हो रूठ गईं ?

माँ...

माँ...

माँ...


बाहों के झूले में झुलाया गया मुझे ।

क्यों आते ही रुलाया गया मुझे ?

क्या किया था मैंने मेरी माँ चलीं गयीं ?

मेरी माँ क्यों चलीं गयीं ?

भनोत् – भानु से उत्पन्न

माँ – भानु, जो जलतीं हैं ।

भानु तो नित जलता है ।

तू भनोत् ।

चल राजगुरू के पुत्र को अब राजा जी खुद ही पालेंगे ।

राजा...

राजा ?

यह क्या है ?

राजा...

रा∫∫∫ जा∫∫∫

हाँ, पिताश्री ने राजा जी को दे दिया मुझे ।  क्यों दे दिया मुझे ?

क्यों दे दिया मुझे ?

क्यों ?

माँ...

माँ...

माँ...

वर्ष बीते, और बीते ।  धीरे-धीरे समझाते हैं ।

“पुत्र, तुम प्रमाण हो ।”

“प्र मा ण... प्र मा ण ?”

“हाँ, प्रमाण ।”

“तुम प्रमाण हो... हमारे शरणागत् की रक्षा करने के प्रयास का प्रमाण ।”

“प्र मा ण...”

“हाँ भनोत्, प्रमाण ।”

मैं टकटकी लगाए देख रहा था – भनोत्, प्र मा ण ।

फिर देर हुई । समय बीता । प्रश्न मन में उमड़ते रहे ।  मन उत्तर को तरसता रहा ।

प्रमाण... शरणागत्... प्रण... भनोत् ।

“हाँ पुत्र, एक स्त्री आयी थी हमारे राज्य में... शरणागत् बन, शरण माँगती ।”

“मैं राजा हूँ, पुत्र, और तुम्हारे पिता राजगुरु ।  शरणागत् की रक्षा करना धर्म है हमारा ।  और स्त्री तो स्वयं शक्ति है ।”

मैं मुस्काया... स्त्री, शक्ति ।  माँ, मेरी शक्ति ।  माँ शक्ति ।

फिर अश्रुपूरित हो गए नयन ।

माँ चली जा रहीं हैं ।

माँ जली जा रहीं हैं ।

माँ शक्ति चली गईं ।

मेरी माँ चली गईं ।

मेरे आँसू देखे न गए उनसे पिताश्री भी रो पड़े ।

रा   जा    जी भी रो पड़े ।

समय बीता पर आँसू बहते रहे ।  बहते आँसू सबसे कहते रहे – 

माँ, मेरी माँ ।

माँ चली जा रहीं हैं ।

माँ जली जा रहीं हैं ।

किसी ने रोका भी नहीं था उन्हें ।  क्यों नहीं रोका था उन्हें ?

माँ मेरी चलतीं रहीं ।

माँ मेरी जलती रहीं ।

वर्ष ।

और वर्ष ।

कुछ और वर्ष ।

हृदय मे अब भी समृतियां थीं ।

आँखों में अश्रु भी थे ।

कहते हैं आज मुझे ले जा रहे हैं ।  पिता जी और रा  जा  जी मुझे ले जा रहे हैं ।

मंदिर ।

मंदिर ।

“पुत्र, तेरी माँ का है ।  यह मंदिर तेरी माँ का है ।”

मैं खुश हूँ ।

माँ, माँ, माँ   ...

यह गोद है, गोद है यह मेरी माँ की ।  माँ की गोद मिल गई मुझे ।  मैं प्रसन्न हो खेलने लगा ।  माँ की गोद में खेलने लगा ।

माँ...

माँ...

माँ...

मेरी माँ ।

लौट आयीं मेरी माँ ।  हम खेल रहे हैं ।

पिता श्री मुस्कुरा रहे हैं ।


रा   जा   जी भी मुस्कुरा रहे हैं ।




Thursday, June 2, 2016

माँ

तेरा नाम प्रथम इस जगती में

तेरी धड़कन का स्पंदन पहला ।

स्पर्श प्रथम तेरे तन का

तेरे आशीष का चंदन पहला ॥


       तेरे आँचल की छैया में माँ

       बचपन खेला, आया यौवन ।

       तेरी लोरी के बयनों में माँ

       फिर लौट के आया है बचपन ॥


बचपन की प्रथम किलकारी में

तेरा मधुर, मृदुल कंपन पहला ।

तुतलाती प्रथम ठिठोली में

तेरे चरणों का वंदन पहला ॥


तेरा नाम प्रथम इस जगती में

तेरी धड़कन का स्पंदन पहला ।

स्पर्श प्रथम तेरे तन का

तेरे आशीष का चंदन पहला ॥

Tuesday, May 24, 2016

पितृ

प्रति श्वास
प्रति स्पंदन
पिता,
करूँ मैं तव चरणन में नमन,
तव प्रेम-रचित
कृति
श्रद्धा-निहित मति,
तव स्नेह अह्लादित मम् मन ।
वेद प्रथम तव स्वर सुने,
सीखी संस्कृति-संस्कृत तुम्हीं से,
विज्ञान-ज्ञान सागर तुम्हीं,
हम मात्र सागर की लहर हैं,
द्वितीय प्रहर हो रात्रि का,
या हो कड़कती धूप पिता,
हो पाठ गणित या क्रीड़ा का,
रहे पथ-प्रदर्शक तुम सदा ।
प्रति श्वास
प्रति स्पंदन
पिता,
करूँ मैं तव चरणन में नमन ।