Thursday, August 13, 2009

दर्द

सदियों तक रगों में बहते-बहते
दर्द लावा-सा बन जाता है ।

धीरे-धीरे साँझ ढलते-ढलते
आँखों से लहू बन बह जाता है ।

हर लम्हा एक पल ज़िंदगी है,
सूरज भी तो पल भर में ढल जाता है ।

आँसुओं की उम्र लंबी होती है
हर आँसू एक ज़ख्म बन जाता है ।

समय कोई ज़ख्म नहीं भरता
हर बीतता लम्हा इसे नासूर कर जाता है ।

2 comments:

nidhitrivedi28 said...

समय कोई ज़ख्म नहीं भरता
हर बीतता लम्हा इसे नासूर कर जाता है ।

this is the biggest truth...
nice...

रविंद्र रवि said...

रितुजी बहुत दर्द है इस कविता में जो पढ़ने से ही महसूस होने लगता है.